जिस तरह पुरानी फ़िल्मों में अदालत के फ़ैसला सुनाने से तीस सेकेण्ड पहले
खलनायक के सीने में ज़ोरदार दर्द उठा करता था
और झूठा अटैक भी आ जाया करता था, ताक़ि तारीख़ बढा दी जाये,
और मामला "खाद्य सुरक्षा बिल" पास करवाने का था।
"अदलत" में फ़िर कभी।
और देखिये ना, इधर उन्हे सीने में "कथित" दर्द हुआ
और उधर "खाद्य सुरक्षा बिल" पारित हो गया। ;)
वैसे एम्स में काफ़ी काँग्रेसी पधारे हुये थे। अगर टुँडा सनक जाता
वैसे एम्स में काफ़ी काँग्रेसी पधारे हुये थे। अगर टुँडा सनक जाता
तो साला पूरा एम्स ही उड़ा देता। 3:)
- सुमित सुमन
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